कुछ किस्से मेरे जीवन के - नवरात्र का पहला दिन






कुछ किस्से मेरे जीवन के - नवरात्र का पहला दिन | Kuchh Kisse Mere Jeevan Ke - Navratra Ka Pehla Din







वो बस सामनें थी, बिलकुल मेरे सामनें मैं उसे निहारे जा रहा था ऐसा लग रहा था मानो वो भी मुझे ही देखना चाह रही थी | हाँ मैं सही हूँ लगता है वो मेरे पास ही आ रही है | मैं उत्सुकता से भरा हुआ अभी भी उसे ही देखे जा रहा था बस उससे बात शुरू ही होनें वाली थी कि पीछे से एक जोर की आवाज़ आई - उठते हो या कुछ चाहिए ??तुम बस पड़े पड़े बिस्तरों में घुसे रहो ?? पापा नहा धो के आ गये है ?? सोते हुए देखेंगे तो खुद ही समझ लेना ??कल ही बता दिए थे कल से नवरात्रे हैं सुबह उठ कर फूल लानें है लेकिन कहाँ? अभी नींद कहाँ पूरी हुई है जनाब की ?? अब फूल मिलेंगे ये भी नहीं लगता ?? आवाज़ मेरी माँ की थी जैसा अक्सर होता मेरी नींद ऐसे ही खुलती थी ख़ासकर जिस दिन नवरात्र शुरू होते थे | पापा का नाम सुनतें ही, जैसे एक लहर आ जाती थी शरीर में और मै इन 2 टन से भी ज्यादा वजनी सवालों के थपेड़े सुननें के बाद ऐसे उठता जैसे किसी गहरी नींद में सोते हुए व्यक्ति को उठाकर 2-4 चांटे चिपका दिए गयें हो | उठता सीधे पड़ोस के राम-जानकी मंदिर की तरफ निकलता और रास्ते में अगर पापा मिल जाते तो हमारा हाल ऐसा हो जाता जैसे चुसी किसमिस तब शुरू होती प्रतिभा प्रयोग परीक्षा, सावधानी के साथ आखों के संपर्क का पूरा ध्यान रखना पड़ता और ऐसे समय शारीरिक स्थिति का पूरा ख्याल रखना पड़ता है आँखें पूरी खुली होनी चाहिए, पूरे शरीर में हलचल होनी चाहिए वगैरह ताकि उनको लगे कि मुझे उठे काफी देर हो गयी है और उसके बाद मैं बहुत सारे काम भी कर चुका हूँ | इतना सब करनें के बावज़ूद भी ऊँट पहाड़ के नीचे आ ही जाता था वो कहते तो कुछ नहीं थे लेकिन उनकी आँखें बिलकुल उस हॉलीवुड वाले हीरो की तरह लगती थी जो आँखों से आग छोड़ता है और आपके सिर के बाल से लेकर आपकी चड्ढी तक जला सकता है | खैर इतना सब झेल झाल के ये नवयुवक आगे की यात्रा पर निकल पड़ता है |






कुछ किस्से मेरे जीवन के - नवरात्र का पहला दिन | Kuchh Kisse Mere Jeevan Ke - Navratra Ka Pehla Din





चलते-चलते बस एक ख्याल और दिल में आता कि अक्सर ये माएं इतनी ज़ल्दी क्यों उठ जातीं हैं !!सुबह से लेकर शाम तक हजारों काम हैं इनके पास, चाहे वो सुबह का नाश्ता हो, दोपहर का खाना हो, रात का खाना हो, शाम का चाय-नाश्ता हो, हमारे तुम्हारे कपडें हो, तुम्हारे किसी सामान की धुलाई करनीं हो, घर में किसी भी चीज़ की धुलाई करनी हो (चाहे वो आपकी धुलाई ही क्यों ना हो ), सिलाई करनी हो, मोहल्ले में चर्चा परिचर्चा करनीं हो और तो और कोई मेहमान आ जाये तो उसकी भी चिंता हो इन सबका ठेका या तो इन्होनें ले रखा है या हमनें दे रखा है खैर ये काम तो दूसरों के लिए थे उनके खुद के काम इसमें शामिल नहीं हैं, चाहे कुछ भी हो कुल मिलाकर बात इस मुद्दे की है कि इतना सब होनें के बाद भी अगले दिन सुबह ज़ल्दी उठना ये बात पूरी तरह मेरे गले नहीं उतरती | इतना सब अगर हम करें तो अगले कुछ दिनों तक चमगादड़ महाशय की तरह उल्टा लटक कर घोर निद्रा और विश्राम के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा | खैर इसी उहा-पोह में मैं मंदिर के दरवाज़े पर होता |





कुछ किस्से मेरे जीवन के - नवरात्र का पहला दिन | Kuchh Kisse Mere Jeevan Ke - Navratra Ka Pehla Din





अभी दो तीन ख़तरों से बचा ही था कि एक नयी मुसीबत सामनें थी | अगर इसमें चूक हुई तो अगले 9 दिनों तक उसका खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता था | पेड़ पर फूल लगभग गायब थे एक आध बचे थे तो वे मंदिर के पुजारी जी नें अपनें लिए बचा रखे थे | बाकी फूल ऊपर थे जो मेरे बस की बात नहीं और नीचे के फूल अगर मैं लेता तो वो पुजारी जी से बगावत करनें के बराबर था | इसी उधेड़ बुन में था कि कोई और आता दिखाई पड़ा और मेरे सामनें धर्मसंकट खड़ा हो गया | कि अगर मैनें कोई निर्णय नहीं लिया तो पछतावा हो सकता है | मैनें तुरंत पुजारी जी से बगावत कर दी मैं नीचे के फूलों पर टूटा वो ऊपर के फूलों पर कुछ ही पलों में में नज़र दौड़ाई तो पेड़ पर हरे रंग के सिवा कोई दूसरा रंग नहीं था | जैसे ही पीछे मुड़ा पुजारी जी इधर ही आ रहे थे फिर क्या था ?? मैं फिर मुड़ा और चुप चाप दुम दबाकर पतली गली से निकल लिया | वहां पर मैनें पुजारी जी से बगावत तो की ही उस बेचारे व्यक्ति को पुजारी जी के कोप का भाजन बनने के लिए भी छोड़ आया और करता भी क्या....!!

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