वो “लाई मूंगफली दानों” का पैकेट जो मुझे दादाजी देते थे |Hindi Blog Articles

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भी आपनें सड़क पर चलतें समय अपनें चलनें की आवाज़ सुनीं है?? या अपनें आस-पास लोगों को आते-जाते ध्यान से देखा है??
क्या आपनें सड़क पर दौड़ती उस भीड़ को देखा है जिसमें कोई अपनें से दोगुनें भारी या तिगुनें भारी वज़न को लेकर रिक्शा खींच रहा होता है, तो कोई पान की दुकान पर खड़ा होकर मोहल्ले से लेकर देश विदेश की बातें कर रहा होता है या पान चबा रहा होता है और कह रहा होता है कि चूना थोड़ा ज़्यादा हो गया?? क्या आपनें कभी पैदल चलनें वाले शख्स को अपनें वाहन से टक्कर मार कर “आगे-पीछे देख के चलो भाई” ये कहनें वाले शख्स का चेहरा देखा है?? अगर नहीं तो शायद आप अपनें जीवन में वो नहीं देख रहें हैं जो आपको देखना चाहिए | चलिए ये तो रही आपकी बात अब हम आपको ले चलतें हैं अपनी दुनिया में जहाँ से वापस आनें का आपका भी मन नहीं करेगा|


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मेंरे नज़रिये से :

जब भी समय मिलता है मैं अक्सर बाज़ार घूमनें निकल जाता हूँ कोई ज़रूरी नहीं कि  मुझे कुछ ख़रीदना ही हो| मैं देखता हूँ उन कुत्तों(वैसे ये नाम इतना अज़ीब क्यों लगता है?) को जो अपनें आस-पास या रास्ते में पड़ने वाली हर mereचीज़ पर मूत्र विसर्जन कर के अपना हक़ जतातें रहतें हैं| मैं देखता हूँ उस मोची को जो अपनी छोटी सी दुकान पर बैठकर कितनी तल्लीनता से जूते चप्पल सिलता रहता है| सबसे खास बात तो ये कि उसकी दुकान सिर्फ़ एक बक्से में समायी होती है लेकिन वही उसकी पूरी दुनिया होती है क्या पता कितनें पेट उस दुनिया पर टिकें हों|


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आज की हकीक़त :


मैं उन पारदर्शी शीशों के माध्यम से देखता हूँ उन लोगों को, जो महंगे रेस्टोरेंट में बैठकर पिज़्ज़ा-बर्गर खातें-पीते तस्वीरें ले रहें जबकि सुबह ही अख़बारों में उन्होंने भले ही ये पढ़ा था कि ये फ़ास्ट फ़ूड लोगों को बीमार बनाता है| मैं कभी कभार खानें वालों की बात नहीं कर रहा| मैं बात कर रहा हूँ उनकी जिनकी दिनचर्या इसी फ़ास्ट फ़ूड और महंगे रेस्टोरेंट में बस गयी है| निःसंदेह ये चटपटा खान-पान सभी को पसंद है लेकिन स्वस्थ्य की कीमत पर नहीं|


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जब मैं खो गया अतीत में :

मैं देखता हूँ चौराहे के एक कोनें में ठेला लगाये उस मूंगफली दानों के साथ लाई मिलाकर नमकीन बनाने वाले ठेले वाले को जो 5 या 10रूपये के पैकेट को बनानें में इतनी लगन से व्यस्त है जैसे कि पूरे दिन की कमाई उसी एक पैकेट में मिल जाएगी| हालांकि इसके पीछे भी एक कारण है कि इस व्यापार में आपको हर ग्राहक का अलग से ख्याल रखना पड़ता है कि कहीं कुछ कम या ज़्यादा न हो जाये जिससे कि ग्राहक को तकलीफ हो जाये और वो दोबारा हमारे यहाँ ना आये| शायद ये एक कारण हैं जो लगभग हर व्यापार में होता है| एक चिंता भी रहती है उस ठेले वाले के मन में कि वैसे भी लोग स्टाइलिश होते जा रहें हैं| कहीं ये स्टाइल मेरे व्यापार पर हथौड़ा ना चला दे इसीलिए अपनें घर के लोगों के खुशियों से लदे सपनें पूरे करनें के लिए वो अपनें इन पैकेटों का दाम भी नहीं बढ़ा सकता| लेकिन आप से ये गुज़ारिश है की जब भी बाहर जाएँ अगर सैकड़ो रूपये पिज़्ज़ा बर्गर में उड़ायें तो 10-20 रूपये का लाई मूंगफली दाना खानें में क्या हर्ज़ है और तो और वो हमारे सांस्कृतिक खान-पान को संजोनें वाले एक तरीके का विशिष्ट नमूना भी है|

इस ठेले वाले को देखकर एकाएक मेरी नज़रें ठहर गयीं और मैं अपनें अतीत से जा मिला...

कहानी मेरे क़स्बे की :

वो बचपन के दिन थे हमारे क़स्बे में सब्जी की बाज़ार दो दिन, रविवार या बुधवार को लगती थी जब गाँव से सब्जी बेचनें वाले आते थे| हालांकि इसके अलावा सभी दिनों में भी  सब्जी की दुकानें लगी रहती थी लेकिन वो लोकल के लोग थे तो सब्जी का दाम भी मनमाने ढंग से लगाया करतें थे| इसीलिए हम लोग ज़्यादातर सब्जी, बाज़ार वाले दिनों में ही ख़रीदते थे|


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मेरे दादाजी की सामाजिकता :

तो हर बाज़ार को मैं अपनें दादाजी की ऊँगली पकड़ के निकल लेता था, बहाना था जब वो सब्जी खरीद के देंगे तो सब्जी का झोला मैं घर ले आऊंगा वो जहाँ चाहें रुक सकतें हैं| इसके पीछे वज़ह ये थी कि मेरे दादाजी काफी सामाजिक हैं और सब्जी खरीदनें के बाद राह चलते जब कभी कोई मिल जाता तो उनकी सामाजिकता बाहर आ जाती और मेरे दादाजी ना जानें कितनें पलों के लिए ये भूल जाते कि सब्जी घर पहुंचानी भी है| इसका परिणाम यह होता कि उन्हें मेरी दादी के कोपभाजन यानि मुंहफुलाव गुस्से का शिकार होना पड़ता| तो जब मैं थोडा बड़ा हुआ तो मेरी नियुक्ति इसी पद पर हुई| हालांकि मेरे लिए इसका कारण कुछ और था|
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कारण था हर बाज़ार के दिन सब्जी खरीदनें वालें चरण के बाद का आखिरी चरण जिसमें मुझे मिलता था वो “लाई मूंगफली दाना का पैकेट” जिसे मैं सबसे छुपा के अकेले हज़म करना चाहता था| लेकिन इस सपनें के पूरे होनें में आखिरी बाधा थीं मेरी माँ जो हर बार मेरे हाँथ से लाई दाना का पैकेट ले कर मेरे भाई- बहनों में बाँट देतीं थी|

लेकिन मैं भी कम नहीं था, बाहर की बात ये है कि मैं अपना हिस्सा तो खाता ही था फिर थोड़ा-थोड़ा कर के सबसे मांग-मांग कर मैं अपनें हिस्से की मात्रा बढ़ाता रहता था|

और अन्दर की बात ये है कि मैं आज भी ऐसा ही करता हूँ..

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