Top 5 Golden Secrets of Happy Life in Hindi [2018] | जीवन में खुश रहनें कारहस्य

Secrets of Happy Life in Hindi
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Top 5 Golden Secrets of Happy Life in Hindi

- जीवन में खुश रहनें का रहस्य -

२१वीं सदी का दूसरा दशक अपनें अंतिम चरण में है | आज की सभ्यताओं को अत्याधुनिक सभ्यताएँ कहा जाता है |
आपनें सुना भी होगा आज कल लोग अपनें को मॉडर्न कहलाना ज़्यादा पसंद करतें हैं | कभी-कभी आपनें लोगों को यह कहते हुए भी सुना होगा – “भैय्या जी हम तो मॉडर्न ज़मानें के लोग हैं हम ऐसी सोंच नहीं रखते हम वैसी सोंच नहीं रखते !!” बाकी अन्दर से भले ही वो पुरा पाषाण काल के हों |

भाई ये कैसी आधुनिकता :

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एक दिन तो हद ही हो गई, मैं एक बार बाँदा से झाँसी के सफ़र पर था, यहाँ एक बात बता दूं अगर आप वास्तविक भारत या यूँ कहें कि प्राचीन आधुनिकता का आंकलन करना चाहतें हैं तो पैसेंजर ट्रेन से यात्रा करें | भारतीय रेल, प्राचीन काल के लन्दन में आपको ले जा कर खड़ा कर देगा |

हर तरफ धुंआ उड़ानें वाले बुजुर्ग नवयुवान, स्टेशन प्लेटफ़ॉर्म पर गड्ढे, कूड़ेदान के बाहर फ़ैला कूड़ा, बैलगाड़ी से भी मंद गति में अव्वल ट्रेनें ये सब व्यवस्थाएं आपको आधुनिकतावाद पर थूंकती मिल जाएँगी खैर ये सब तो नकारात्मक विशेषताएं हैं लेकिन इनकी वज़ह से कुछ ऐसी चीज़ें बाहर निकल के आतीं हैं जो किसी का भी मन मोंह लें |

वो हैं ट्रेन की धीमी चाल की वज़ह से आस पास के प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों वातावरणों को निहार पाना | सस्ते किराए भाड़े की वज़ह से हर प्रकार के, और अधिक लोगों का यात्रा करना |

तो पहली बात जिस दिन मैं सफ़र पर था तो मेरे पास पैसेंजर ट्रेन के अलावा कोई विकल्प था ही नहीं | और दूसरी बात उन शानदार प्राकृतिक दृश्यों, भारतीय संस्कृति की अगुवाई करते हर प्रकार के लोगों को देख पाना और सस्ता किराया, इतना लालच मुझ जैसे मध्यम वर्गीय नवयुवक के लिए काफी था |
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समान्यतया मैं सिंगल विंडो वाली सीट पर बैठना पसंद करता हूँ आप भी करतें होंगें | क्योंकि वहां बैठनें से आप बाहर के नज़ारे अच्छे से देख सकतें हैं, प्राकृतिक हवा मिलती है और लोगों की कृत्रिम प्राणघातक हवा से आप बचे रहतें हैं |

पहाड़ों के सुन्दर विहंगम दृश्यों को निहारने में मैं खोया हुआ था | ट्रेन अपनी मंद गति से अद्भुत पठारी ढालों पर चढ़-उतर रही थी | कि इतनें में बीच वाली सीटों पर बैठे लोगों में दार्शनिकता का जिन्न जाग गया लोग एक-दूसरे से ज़ोरदार विचार विमर्श करनें लगे |

लेकिन उस विमर्श का विषय बड़ा रुचिकर था सो मेरा भी ध्यान प्राकृतिक छटाओं से हटकर उधर चला गया | विषय था “मॉडर्नाइजेशन” या सामान्य भाषा में आप आधुनिकता कह सकतें हैं | उसमें एक भाई साहब मुंह में पान भरे अपनी बात ज़ोरदार तर्क से रखते और ये सिद्ध करनें की कोशिश करते कि उनसे ज़्यादा मॉडर्न इस संसार में तो क्या पूरे ब्रह्मांड में कोई नहीं होगा फ़िर ख़ुद ख़ुदा की क्या औकात |

अचानक घंटों के अथक प्रयासों के बाद मुंह में पान से निकले द्रव्य का आयतन बढ़ जानें की वज़ह से जब उनका बोलना दूभर हो गया | तब वो जोश में उठे और टॉयलेट के बाहर वाले वॉशबेसिन के पास में रक्तवर्ण की पान पीक से उन्होंने मधुबनी पेंटिंग कर डाली | और ये देखते ही उनके मॉडर्न विचारों का तेल निकल गया | ऐसे मॉडर्न लोग आपको हर गली मोहल्ले में मिल जायेंगे |

क्या हम वाक़ई माडर्न हैं??


आइये अब हम ये भी देखतें हैं कि आखिर हम कितनें मॉडर्न हैं ??

हमारी प्राचीन सभ्यताएं पुरुष प्रधान रहीं हैं और ये काम करनें का श्रेय भी पुरुषों को ही जाता है | मैं मानता हूँ कि स्त्री पुरुष की समानता भी “मॉडर्नाइजेशन” का बेहतर उदाहरण है लेकिन वर्तमान में इसकी वास्तविकता क्या है?? ये भी हमें जानने की आवश्यकता है | 

चलो इसे समझतें हैं :

अगर आप उत्तर भारत में रहतें हैं तो रोटी आपके खान-पान में अवश्य शामिल होगी | आप रोटियां खाते होंगे थोड़ी अच्छी नहीं लगती होंगी तो बनानें वाले से तुरंत शिकायत भी करतें होंगे | ज़्यादातर घरों में खाना बनाने का काम घर की स्त्रियाँ करतीं हैं | लेकिन अब आप एक बात बताइये कि क्या कभी आपनें रोटियां बनायीं हैं??

अपनी माँ, बहन, पत्नीं या किसी भी फीमेल सम्बन्धी के लिए??

अगर आपका ज़वाब हाँ है ! तो आप लाखों या करोड़ों में शायद एक ही होंगें | और अगर आप इनमें हैं तो निश्चित ही ये काबिलेतारीफ़ बात है |

परन्तु आपका ज़वाब यदि ना है ! तो ज़रा सोंचिये कि “भारतीय संविधान” के “समानता के अधिकार” में आप अपना कितना योगदान दे रहें हैं ?? शायद कुछ भी नहीं |


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और अगर ऐसा है तो क्या सच में हम मॉडर्न हैं या क्या हमारी सोच वाक़ई मॉडर्न है ??


खैर ये तो सिर्फ एक क्षेत्र था जो मैनें आपके सामनें रखा | ना जानें कितनें ऐसे क्षेत्र है जिनमें आज भी पहले से कहीं ज़्यादा असमानता का शिकार हो रहीं हैं इस समस्त संसार की आधी दिव्यात्माएं |

दंगल, मैरी कॉम जैसी ना जानें कितनीं, सैंकड़ों फिल्मों के माध्यम से वास्तविक जीवन की महान नायिकाओं को बड़े पर्दें पर उतरा गया | करोड़ों लोगों नें देखा, फ़िल्में आई और गयीं लेकिन हमारी सोंच वहीँ की वही रूढ़िवादिता की पुरानी जंजीरों में जकड़ी रहीं | क्या हमनें उन फिल्मों को देखनें के बाद खुद में कोई बदलाव महसूस किया ?? मैं तो सोंचता हूँ कि हम में से ज़्यदातर लोगों नें किसी भी प्रकार के बदलाव की ज़रुरत ही नहीं समझी |

मैं तो कहता हूँ जब हमें ऐसे बदलाव की ज़रुरत ही नहीं महसूस होती तो धिक्कार है ऐसी आधुनिकता पर, उस मर्दवादी सोंच पर जो खुद को मॉडर्न सिद्ध करनें के लिए खोखला चोला पहन कर दोहरा रवैया अपनाती है |

अगर आप ये पढनें के बाद कुछ करना चाहतें हैं तो सबसे पहले ये सोंचिये कि क्या खाना बनाने या घर का सारा काम करनें का ठेका घर की स्त्रियों नें ही ले रखा है? क्या वाक़ई में ये ईश्वर की ही देन है या पूरे विश्व की आधी आबादी, दूसरी आधी आबादी को बिना किसी कारण के अपनें अंकुश में रख कर सारे काम करवाती है?

आखिर संसार में दुःख क्यों है ?



अब हम ये समझतें हैं कि आखिर लोग दुखी क्यों हैं इस संसार में ??

मैं यहाँ पर समस्त गीता के उपदेश आपको नहीं देनें वाला | लेकिन अगर आप एकांत में बैठकर सोंचें अपनीं शक्तियों के बारें में तो आपको एहसास हो जायेगा कि आप अवश्य ही किसी अलौकिक ऊर्जा की वज़ह से चलायमान हैं |

इस ऊर्जा का एकमात्र केंद्र वो परमात्मा है जिसके हम समस्त प्राणी अभिन्न अंग हैं |

तो क्या समझे ??

आप एक गहरी सांस लें (सिर्फ नाक से !!) फिर मैं बताता हूँ कि इस ब्रह्मांड के सभी प्राणी एक-दूसरे से ऊर्जाओं के रूप में जुड़ें हैं | जिसका एकमात्र श्रोत परमात्मा है |

जिस प्रकार शरीर के एक अंग में पीड़ा होनें पर उसका आभास संपूर्ण शरीर को होता है | उसी प्रकार इस संपूर्ण संसार में जब तक एक भी जीव पीड़ित है, प्रताड़ित है, तब तक इस संसार से दुखों का अंत नहीं हो सकता |

सुखी कौन है ?

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आप ख़ुद से पूछिए आख़िर कौन है इतना सुखी??

मैं भी अपनें आप से पूछता रहता हूँ जब किसी धन धान्य से लदे-फंदे व्यक्ति को दिल का मरीज़ देखता हूँ | कोई बुरा मत मानना लेकिन आज ये हर घर की सच्चाई है |

मैं देखता हूँ, एक तरफ़ जिनके पास सारी सुख सुविधाएँ होती हैं वो इसी चिंता में अपनी हालत ख़राब कर लेतें हैं कि कहीं ये सुख सुविधाएँ समाप्त ना हो जाएँ | उनके पास अगर कोई चिंता नहीं भी होती है तो भी वे नयी चिंताओं को अपनें आप ही बना लेते हैं |

जैसे आजकल एक चिंता बहुतों को सताये रहती है कि पड़ोसी नें इतनी तरक्की कैसे कर ली ?? और यही सोंच-सोंच कर वो अपना हाज़मा ख़राब कर लेतें हैं | फलां रिश्तेदार नें गाड़ी, घोड़ा, मकान व जेवरात आदि कैसे ख़रीद लिया ? और तो और ऐसे लोग दूसरों की चिंताओं में इतना खो जातें हैं कि ख़ुद के सुखों की भी बलि दे देतें हैं |

दूसरी तरफ मैं देखता हूँ जिनके पास न सही से रहनें के लिए घर हैं, न खानें के लिए खाना, वो उनसे अधिक स्वस्थ्य व सुखी जीवन जीतें हैं उनकी तुलना में जिनके पास सब कुछ है | इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण उनका सबसे अच्छा गुण नयी चिंताओ को ना पालना है |  



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हालांकि इन लोगों की ज़िंदगी विलासित सुख सुविधाओं से भरी नहीं होती लेकिन कम संसाधनों में भी वो खुशियों के हजार मौके ढूंढ ही लेतें हैं |

ये मैं सोंचता हूँ ! हो सकता है आप इस बात से सहमत ना हों | आपको लगता हो कि जब सारी सुविधाएँ जैसे नौकरी, धन, गाड़ी आदि ये सब होता है तो व्यक्ति ज्यादा सुखी होता है | लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि तब हम अपनी चिंता बढ़ाने की सिर्फ वज़हें बढ़ाते हैं और कुछ नहीं |

आप इस बात पर तभी यकीन कर पाएंगे जब आप नीचे लिखे वास्तविक जीवन के विश्लेषण को पढेंगे :

सुख का विश्लेषण :


यहाँ हम दो प्रकार के पति-पत्नियों के जीवन से सम्बंधित पड़ताल करेंगे और जानेंगे कि वाक़ई में कौन सही तरीक़े से जीवन जी रहा है | ये पढ़ना आपके लिए बहुत ज़रूरी है चाहे आप अभी शादीशुदा हो या भविष्य में क्या फ़र्क पड़ता है |

सबसे पहले हम नौकरी पेशा करनें वाले या जिनके पास पर्याप्त धन है उन दम्पत्तियों की बात करेंगें | वो इंजीनियरिंग, मेडिकल, पॉलिटिकल, फ़िल्म इंडस्ट्री या किसी भी क्षेत्र से हो सकतें हैं और ज़ाहिर सी बात है उनका जीवन सुख सुविधाओं वाली सारी ज़रूरतें पूरी करनें में सक्षम होगा | कहीं आने-जानें वाले साधनों, रहनें के लिए घर, खानें-पीनें और पहननें-ओढ़ने के लिए चीज़ों की उनके पास कोई कमी नहीं |

लेकिन क्या इतना सब होनें के बाद वो ख़ुशहाल जीवन जी पातें हैं ??

ये समझनें के लिए आपको ये जानना ज़रूरी है कि प्रतिक्षण हमारी उम्र कम हो रही है | अगर मान लेतें हैं कि हमारी उम्र 100 वर्ष थी तो अब उसमें से कुछ बसंत आपनें अब घटा दियें हैं | उम्र जब-जब घटी होगी ज़ाहिर हैं आपनें खुशियाँ मनायी होंगीं | इस बात के लिए कि बीता हुआ एक साल बहुत अच्छा रहा और आगे भी ऐसा ही रहे | अब आप सोंचिये जीवन का उद्देश्य क्या है?- जिंदगी भर दौड़ भाग कर के धन इकट्ठा करना ?? वो भी सारी खुशियों का गला घोंटकर ??
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या उसका जीवन ज़्यादा उद्देश्यपूर्ण है जो सब कुछ करते हुए भी अपनें जीवन के हर पल का आनंद लेता है | साथ ही साथ हर लम्हा अपनें आप को नयी ऊर्जा के साथ महसूस करता है | जिससे कि वो दुःख में भी स्थिर रहता है और सुख में भी | चिंताओं में होते हुए भी एक नयी आशा की किरण वो अपनें भीतर जलाये रखता है क्योंकि उसे पता है कि उसके जीवन में सुख पुनः लौटनें वाला है |

तो बात करतें हैं उन पति-पत्नियों की जिनके पास सब कुछ है | वे दिन रात अपनी तरक्की के चक्कर में ये भूल जातें हैं कि जीवन का मुख्य उद्देश्य जीवन को आनंद के साथ व्यतीत करते हुए अपनें समस्त कर्मों को करना है | और केवल आनंद ही ऐसी अनुभूति है जो आप ख़ुद भी महसूस करते हो और दूसरों को भी अपनें माध्यम से महसूस होनें का अवसर दे सकते हो |

वे भूल जातें हैं कि वास्तविकता में घरवालों या घरवाली को पैसे, शोहरत आदि से ज़्यादा उनके प्यार की ज़रुरत है | और उनका वो प्यार उनके परिवार वालों को ऐसे सैकड़ों लम्हें दे सकता है जो इतिहास के पन्नों में भी उनके जीवन को महका दें | ये बात ना वे ख़ुद महसूस करतें हैं ना अपनें परिवार वालों को ये महसूस करनें का अवसर देतें हैं |

ये बात आप ख़ुद से पूछिए कि ऊपर लिखी बात में कितनी सच्चाई है ??!!

मेंरे हिसाब से ऐसे पति पत्नियों में वो भाव नहीं होता जो होना चाहिए क्योंकि समय के आभाव में वो साथ  वक़्त बिताना तो लगभग भूल जातें हैं | उनका रिश्ता केवल नाम भर का रह जाता है | उनमें वो जुड़ाव ख़त्म सा हो जाता है जो आपस में प्यार बढानें में उत्प्रेरक का कार्य करता है | क्योंकि भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में ठहराव कहाँ है | जब ठहराव नहीं है तो रिश्तों में जुड़ाव होनें का सवाल ही नहीं उठता |

उनको ये याद ही नहीं रहता कि आखिर वो इतनीं मेहनत कर क्यों रहें हैं ? क्या आपको पता है कि आप कोई भी काम, जो मन से, प्रतिदिन करतें हैं, वो किसके लिए करतें हैं??

अब हम बात करतें हैं उनकी, जिनके पास कहनें को तो कुछ भी नहीं होता लेकिन ज़िंदगी का सबसे अनमोल रत्न उन्हीं के पास होता है |

और उस महान रत्न का नाम है – “संतोष” !!

यहाँ तक कि कबीरदास जी नें भी इसकी महत्ता का गुणगान किया है आप ख़ुद ही पढ़ लीजिये –

गोधन, गजधन, बाजधन, और रतन धन खान |

जब आवे ‘संतोष’ धन सब धन धूरि समान ||

आप देखतें होंगे जब एक गरीब काम पर जाता है या लौट के घर आता है तो हर पल उसके दिमाग में उसका परिवार होता है | उसकी पत्नी हमेशा उसकी आँखों में बसी होती है | जो रोज़ खाना खाते समय उसे पंखा झलती है, भले ही लड़ाई करती है लेकिन सुख-दुःख हर घड़ी में उसका साथ देती है |

उनमें मैनें हजारों बार देखा है कि जब कोई बाज़ार जाता है तो उनका बच्चा पति के कंधों पर बैठा होता है और साथ में अपनें चेहरे पर गर्व की अनुभूति लिए उसकी पत्नी होती है |

गाँवों में तो ऐसा अक्सर होता है | लेकिन मैनें संपन्न घरों में उस भाव से पति पत्नी को साथ जाते नहीं देखा जो भाव एक ग़रीब जोड़े को साथ जाते देख उनके नेत्रों से स्वतः झलकता है |इसका मतलब यह बिलकुल नहीं कि सुखी होनें के लिए या चिंता मुक्त होनें के लिए, सबको ग़रीब होंना ज़रूरी है या उसकी पत्नी का अपनें पति को हाँथ से पंखा झलना ज़रूरी है | यहाँ ज़रुरत इस बात की है उनमें वो प्रेम भाव कितना है जो आनंद की अनुभूति के लिए अत्यावश्यक है |

ये प्रेम भाव तभी आपके भीतर अपना आकार गृहण कर पायेगा जब आप चिंता मुक्त हो कर जीवन जियेंगे और इसका रहस्य सिर्फ संतोष रुपी महाधन में निहित है |
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दुःख से सबसे ज़्यादा पीड़ित लोग :



सुख का रहस्य जाननें के साथ हमे ये भी जान लेना ज़रूरी है कि कौन लोग दुःख से सबसे ज़्यादा ग्रसित हैं?

यहाँ पर मैं आपसे एक विशेष प्रकार के लोगों का ज़िक्र करूँगा जो हर प्रकार के कार्यों में पाए जातें हैं | ये वे लोग हैं जो बिना कुछ सोंचे समझे किसी का भी अनुसरण करनें लग जातें हैं |

ये कभी भी कार्य करनें से पहले ये नहीं सोंचते कि- मैं ये कार्य क्यों कर रहा हूँ या क्या ये कार्य मेरे जीवन के उद्देश्यों को पूर्ण कर पायेगा ??

अगर आप मुझसे पूँछें कि आखिर मैं ऐसी परिस्थिति में क्या करता? तो मैं कभी भी उस काम को ना आजमाँऊं जो मेरे सपनों और जीवन के खांचों में सही ना बैठता हो |

भाई ये बताओ किसी दूसरे के साइज़ की पैंट आप पहन सकतें हैं क्या ? यदि पहन भी लें तो क्या वो आपके लिए आरामदायक होगी??

चलिए मैं मान लेता हूँ आपनें पहन ली किसी दूसरे की साइज़ की पैंट तो अगर ज़्यादा कसी हुई तो रक्त प्रवाह के साथ-साथ आपकी हवा का संतुलन बिगड़ सकता है या ज़्यादा ढ़ीली हुई तो आपकी दुकान बिना बेल्ट के सदैव प्रदर्शन के लिए खुली रह जाएगी |

कहनें का मतलब ये है जब हम एक कपडे के लिए किसी का अनुसरण नहीं कर रहें है तो जिन कर्मों पर आपके जीवन का उद्देश्य टिका हो उनके लिए आप बिना किसी सोंच विचार के किसी का भी अनुसरण कैसे कर सकतें हैं |


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अब मैं आपको 5 ऐसी बातें बताऊंगा जिनसे आप अपनी जिंदगी को महसूस कर सकें और ख़ुशहाल बना सकें :

काम वो करें जिसका हो जुनून

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मेंरी ज़िंदगी का तो मकसद ही ऐसा है जो मुझमें जुनून भरता रहता है | इसलिए कोई भी काम करनें से पहले ये ज़रूर सोंचें कि क्या आपकी रूचि है उस काम में? क्या आप वो काम बिना किसी चिंता या उलझन के कितनीं भी देर तक कर सकतें हैं?

ऐसा सोचनें से आपको पता चल जायेगा कि आप वाक़ई जो करनें जा रहें है वो आपके काबिल है या नहीं | इसे ही हम ख़ुद का मूल्यांकन या आंकलन करना कहतें हैं |

तो जिस भी काम में आपकी रूचि होगी ज़ाहिर है उस काम को करते हुए ऊँचाइयों का नया आसमान छूनें के लिए आपमें जुनून अपनें आप भर जायेगा |


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हमेशा हँसनें के मौके देखें रोनें के नहीं

ये बात अपनें में अद्भुत है | क्योंकि आज कल हर कोई अपना दुःख ढूंढ के ख़ुश होना चाहता है | इसके लिए आपको एक उदहारण देता हूँ कभी-कभी कुछ लोग कहतें हैं कि शायद मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है और वो आपसे ये देखनें को कहतें हैं कि उनको बुखार है या नहीं, अगर आप देख के उन्हें बतातें हैं कि बुखार नहीं हैं | तो बहुत सारे लोग इसी चिंता में डूब जातें है कि बुखार नहीं हैं |

आप भी ये ना ढूंढें कि आपके पास क्या नहीं है बल्कि आप ये सोंचें कि आपके पास क्या है | और उसी में नई-नई खुशियाँ तलाशें |

खुश रहनें के लिए एक काम बहुत ज़रूरी है कि किसी भी बात पर गुस्सा होनें से पहले सोंचें कि आपको गुस्सा करनें से क्या फ़ायदा होगा | आप पाएंगे कि कुछ भी नहीं मिलेगा गुस्सा करनें से, बल्कि अपना समय ही ख़राब होगा |

आप जैसे भी हों ख़ुद से प्यार करें

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एक ख़ुशहाल जीवन जीनें के लिए ये बहुत ही अच्छा तरीका है अपनें को पहचानने का | ज़्यादातर लोग दूसरों को देखतें रहतें हैं और उनके जैसा बनना चाहतें हैं | इस चक्कर में वो अपनी ख़ासियत को नज़रंदाज़ कर देतें हैं | जिंदगी भर ऐसे लोगों को दुःख के सिवाय कुछ प्राप्त नहीं होता |

ज़ाहिर सी बात है इस संसार में हर कोई दिखनें में अलग है और हर किसी की योग्यताएं एक-दूसरे से भिन्न हैं तो किसी और से अपनी तुलना करना ख़ुद अपनें साथ बेईमानी करनें जैसा है |

इसीलिए आप जैसे हैं ख़ुद से प्यार करें |

अपनें अन्दर सीखनें का ज़ज्बा पैदा करें

इस संसार में सबकुछ गतिमान है | जो प्रत्यक्ष रूप से गतिमान नहीं नज़र आते उनमें भी अणु-परमाणु के कण गतिमान हो सकतें हैं | इसीलिए अगर हम अपनें जीवन की उद्देश्य पूर्ति के साथ-साथ ख़ुद का अस्तित्व बनाये रखना चाहतें हैं तो हमें भी गतिमान होना बहुत ज़रूरी है |

इसके लिए आपका चलना ज़रूरी नही बल्कि आपकी सोंच और बुद्धिमत्ता का प्रगतिशील होना बहुत ज़रूरी है |

और ये करना बहुत ही आसान है | बस आपको अपनें अन्दर हर पल कुछ नया सीखनें का ज़ज्बा पैदा करना होगा |

जैसे पेशे से मैं एक यांत्रिक अभियंता हूँ लेकिन जब मैंने ब्लॉग बनाया तो मैंने कंप्यूटर साइंस की बारीकियां भी सीखीं और सीख भी रहा हूँ |

मैं नहीं कहता आप भी यही करें लेकिन जिस भी क्षेत्र में आपको मज़ा आता हो उस क्षेत्र में कुछ न कुछ ज़रूर सीखतें रहें इससे आपका ज्ञान भी बढ़ेगा और आपको आत्मसंतुष्टि भी मिलेगी |
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ख़ुद के लिए समय निकालें



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आखिर में ये आपके लिए अमृत के समान बात है | आप ख़ुद के लिए समय निकल कर ख़ुद का विश्लेषण करें कि आपकी अच्छाइयां क्या हैं, ऐसा क्या है जिससे आप आपनें आपको हमेशा ऊर्जावान रख सकतें हैं?? इससे आपका आत्मविश्वास आसमान छुएगा और आप ख़ुद ही सकारात्मक ऊर्जा से भर जायेंगे |

साथ ही साथ अपनें खान-पान का विश्लेषण ज़रूर करें | और इस समय में, जो आपनें ख़ुद के लिए निकाला है उसमे थोड़ा व्यायाम अवश्य करें | भले ही 5 मिनट के लिए क्यों ना दौड़ लगायें लेकिन इतना व्यायाम अवश्य करें जिससे आपके शरीर की अशुद्धियाँ पसीने के रूप में बाहर निकल जाएँ |


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